नई दिल्ली। आयोजित दो दिवसीय ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का सफल समापन हो गया। सबसे बड़ी उपलब्धि संयुक्त बयान को मिली मंजूरी रही।
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नई दिल्ली। आयोजित दो दिवसीय ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का सफल समापन हो गया। सबसे बड़ी उपलब्धि संयुक्त बयान को मिली मंजूरी रही। नई दिल्ली घोषणापत्र में संकेत भी थे और संदेश भी। दुनिया ने भारतीय कूटनीतिक का इकबाल बुलंद होते हुए देखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन दिनों में विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों के साथ 15 औपचारिक द्विपक्षीय बैठक की।
इन बैठकों के अलावा उन्होंने कई वैश्विक नेताओं और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रमुखों के साथ अलग से मुलाकात और अनौपचारिक बातचीत का सिलसिला भी चला। प्रधानमंत्री की इन बैठकों ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को केवल बहुपक्षीय विचार-विमर्श का मंच भर नहीं रहने दिया, बल्कि भारत के लिए एक साथ कई देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने का अवसर भी बना डाला।
रूस, ईरान, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, मलेशिया, वियतनाम, कजाकिस्तान, फिलीपींस, यूएई और अफ्रीकी देशों के नेताओं के साथ हुई बातचीत में भारत के रणनीतिक, आर्थिक, ऊर्जा, रक्षा और क्षेत्रीय हितों से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे। प्रधानमंत्री मोदी की 11 सितंबर को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बैठक से इस कूटनीतिक सिलसिले की शुरुआत हुई। जब रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरण लगातार बदल रहे हैं।
इसी दिन मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से भी मुलाकात की। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच ईरान के साथ भारत के संबंधों का महत्व और बढ़ गया है। चाबहार बंदरगाह, मध्य एशिया तक संपर्क, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता भारत के लिए ईरान को महत्वपूर्ण साझेदार बनाते हैं। प्रधानमंत्री ने इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस से भी मुलाकात की।
वैश्विक दक्षिण, बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार और संयुक्त राष्ट्र सुधार जैसे मुद्दे भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के प्रमुख एजेंडे में रहे हैं। 12 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी की द्विपक्षीय बैठकों का सिलसिला और तेज हुआ। उन्होंने इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद अली, मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम, अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान और वियतनाम के प्रधानमंत्री ले मिन्ह हंग के साथ अलग-अलग बैठकें कीं।
इन मुलाकातों में रक्षा और सुरक्षा सहयोग, ऊर्जा, निवेश, व्यापार, दुर्लभ खनिज, अंतरिक्ष और संपर्क जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा हुई। भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र के साथ संबंधों के लिहाज से यूएई के नेतृत्व के साथ बातचीत भी महत्वपूर्ण रही। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत ईरान के साथ अपने पारंपरिक संबंधों के साथ-साथ यूएई और अन्य अरब खाड़ी देशों के साथ अपनी मजबूत रणनीतिक एवं आर्थिक साझेदारी को भी बनाए रखना चाहता है।
हालांकि, 12 सितंबर की सबसे ज्यादा चर्चित बैठक प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई। गलवान संघर्ष के बाद भारत-चीन संबंधों में आए तनाव के बीच दोनों देशों ने हाल के समय में संबंधों को स्थिर करने की दिशा में कदम उठाए हैं। ऐसे में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान मोदी-शी मुलाकात को दोनों देशों के बीच संवाद की प्रक्रिया के लिहाज से अहम माना गया। चीन ब्रिक्स का एक प्रमुख सदस्य और भारत का महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है।
हालांकि सीमा, व्यापार और रणनीतिक मुद्दों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद अब भी कायम हैं, लेकिन उच्चस्तरीय संवाद संबंधों को स्थिर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसी बीच राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भी ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से मुलाकात की। प्रधानमंत्री मोदी के साथ पेजेशकियान की बैठक के एक दिन बाद हुई यह मुलाकात भारत और ईरान के बीच उच्चस्तरीय संपर्क की निरंतरता को दर्शाती है। 13 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी की द्विपक्षीय कूटनीति का सिलसिला जारी रहा।
एक दो नहीं इस दिन भी करीब 7 द्विपक्षीय मुलाकात की। उन्होंने कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कसीम-जोमार्ट टोकायेव, फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस जूनियर, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा के साथ बैठकें कीं। इसके बाद मोदी ने बुरुंडी के राष्ट्रपति एवरेस्ट नदाइशिमिये, नाइजीरिया के उपराष्ट्रपति काशिम शेट्टीमा और युगांडा की उपराष्ट्रपति जेसिका अलुपो के साथ भी द्विपक्षीय वार्ता की।
इस तरह तीन दिनों में प्रधानमंत्री की 15 औपचारिक द्विपक्षीय बैठकें भारत की सक्रिय कूटनीतिक सक्रियता को दर्शाती हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संपर्क केवल औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं रहा। ब्रिक्स के दौरान प्रधानमंत्री ने कई अन्य राष्ट्राध्यक्षों, शासनाध्यक्षों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के नेताओं के साथ ‘पुल-असाइड’ यानी अलग से छोटी मुलाकातें भी कीं।
ब्रिक्स के इस सम्मेलन में भारत ने जहां बहुपक्षीय सहयोग, वैश्विक दक्षिण की आवाज, संयुक्त राष्ट्र सुधार और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दों को आगे बढ़ाया, वहीं प्रधानमंत्री मोदी की लगातार द्विपक्षीय बैठकों ने भारत को अलग-अलग देशों के साथ अपने विशिष्ट हितों पर सीधे बातचीत करने का अवसर दिया। रूस, ईरान और चीन के साथ बैठकों ने जहां भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच संतुलन की तस्वीर पेश की, वहीं अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य एशिया और खाड़ी देशों के नेताओं के साथ बातचीत ने भारत की व्यापक वैश्विक साझेदारी को रेखांकित किया। (आईएएनएस)
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