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यूपी राज्यसभा की 10 सीटों का चुनावी गणित, पिछली बार की तरह इस बार भी 10वीं सीट पर फंसेगा पेंच

Rajya Sabha : विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों पर होने वाला चुनाव 2027 के सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा है।✍️Anil Shahi

By HO BUREAU 

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Rajya Sabha : विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों पर होने वाला चुनाव 2027 के सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा है। बीजेपी और सपा की सदस्य संख्या के हिसाब से राज्यसभा का अनुपात 8-2 का होता दिख रहा है, लेकिन 8-2 की पटकथा के बीच 10वीं सीट को लेकर इस बार भी पेंच फंसता नज़र आ रहा है।

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हालांकि सत्तारूढ़ बीजेपी के लिए फिलहाल डगर आसान दिखती है, लेकिन अगर गठबंधन के विरोधी स्वर राज्यसभा चुनाव के समय मुखर हुए तो राह मुश्किल हाेगी और समाजवादी पार्टी को फिर एक बार अपनों को सहेजना एक बड़ी चुनौती होगी।

चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के चुनाव का शेड्यूल जारी कर दिया है। शैड्यूल के मुताबिक 29 सितंबर को अधिसूचना जारी होगी। नामांकन 06 अक्टूबर तक, 07 को स्क्रूटनी, 09 अक्टूबर तक नाम वापसी का समय होगा जबकि 16 अक्टूबर को सुबह 9 से शाम 4 बजे तक मतदान के बाद उसी दिन शाम 5 बजे से मतगणना शुरू हो जाएगी और 19 अक्टूबर तक प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी।

उत्तर प्रदेश के जिन 10 सांसदों का कार्यकाल 25 नवंबर को खत्म हो रहा है। उनमें भाजपा के हरदीप सिंह पुरी, अरुण सिंह, गीता शाक्य, नीरज शेखर, बृजलाल, बीएल वर्मा, सीमा द्विवेदी और दिनेश शर्मा शामिल हैं। दिनेश शर्मा अंडमान निकोबार के उपराज्यपाल बनाए जाने के बाद पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं।

समाजवादी पार्टी से प्रो. रामगोपाल यादव और बसपा से रामजी गौतम का कार्यकाल भी खत्म हो रहा है। मौजूदा स्थिति में 8 भाजपा, एक सपा और एक बसपा है, लेकिन चूंकि अब विधानसभा में बसपा का कोई सदस्य नहीं है ऐसे में बीएसपी राज्यसभा में शून्य हो जाएगी। 10 सीट में से 7 सीट बीजेपी को और समाजवादी को 2 सीट मिलना तय है, लेकिन विधानसभा की गणित इस बार भी 10वीं सीट पर पेंच फंसा सकती है।

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राज्यसभा की 10 सीटों के इस चुनाव को समझने के लिए हमें विधानसभा के भीतर की गणित को समझना होगा। यूपी विधानसभा की कुल 403 में से 8 सीटें रिक्त हैं। बीते दिनों में 8 विधायकों का निधन हो गया है, जिसमें बीजेपी के 4, समाजवादी पार्टी के 3 और बीएसपी के एक मात्र विधायक उमाशंकर सिंह शामिल हैं तो अब कुल 395 विधायक (बीजेपी 255, अपना दल 13, रालोद 9, सुभासपा 6, निषाद पार्टी 5, सपा 100, कांग्रेस 2, जनसत्ता दल 2 और 3 असंबद्ध मनोज पांडे, राकेश सिंह, अभय सिंह) ही वोट डालेंगे।

राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए प्रथम वरीयता के करीब 37 वोटों की जरूरत है। आंकड़ों के मुताबिक बीजेपी नीत गठबंधन के पास 291 विधायकों का समर्थन है जिसमें भाजपा के 255, अपना दल एस के 13, रालोद के 9, सुभासपा के 6, निषाद पार्टी के 5 विधायक और असंबद्ध विधायक मनोज पांडेय, राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह शामिल हैं।

रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया समेत जनसत्ता दल के दो विधायकों ने पिछले चुनाव में भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में वोट किया था और कुछ विपक्षी विधायकों ने भी क्रॉस वोटिंग कर संजय सेठ को जिताने में मदद की थी। अगर ऐसा इस बार भी हुआ तो बीजेपी के लिए 8वीं सीट जीतने में कोई मुश्किल नहीं आयेगी। परन्तु ताजा हालात पर नज़र डालें तो बीजेपी के सहयोगी दल निषाद पार्टी और सुभासपा का विरोध अगर ऐन चुनाव के वक्त मुखरित हुआ तो बीजेपी के लिए बड़ी मुश्किल होगी।

उधर विपक्षी गठबंधन के पास संख्या बल तकरीबन 102 है। जिसमें सपा के 100 और कांग्रेस के 2 विधायक हैं। सपा के लिए एक डर ये भी है कि पिछले चुनाव की तरह इस बार भी उनके कुछ विधायक क्रॉस वोटिंग न कर बैठें। ऐसे में अब 10वीं सीट पर जीत की कशमकश दोनों गठबंधन के लिए पेशानी पर बल ला सकते हैं।

यूपी विधानसभा में मौजूदा विधायकों की गणित और पिछले चुनाव के अनुभव के आधार पर उतर प्रदेश से राज्यसभा में 8-2 का फॉर्मूला बनता दिख रहा है। भाजपा सात सीटें आराम से निकाल लेगी तो सपा की झोली में दो सीटें आसानी से आ जायेंगी। बसपा के पास विधानसभा में एक भी विधायक न होने से उसका राज्यसभा से पूरी तरह सफाया निश्चित है और उसकी खाली हो रही सीट सपा के खाते में जाना भी तय है। 7 और 2 का आंकड़ा तो ठीक है, असली लड़ाई दसवीं सीट को लेकर है।

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सात सीट जीतने के बाद भाजपा गठबंधन के पास आधिकारिक रूप से 32 और दो सीट जीतने के बाद सपा के पास कांग्रेस को लेकर 28 विधायक बचेंगे। ऐसे में भाजपा को जहां अपनी आठवीं सीट निकालने के लिए राजा भैया समेत सहयोगियों को एकजुट रखना होगा और विपक्षी दल में फिर सेंधमारी करनी होगी, वहीं समाजवादी पार्टी को तीसरी सीट के लिए वोटों का जुगाड़ खुद के विधायकों को सहेजते हुए अन्य छोटे दलों को साथ लाकर करना होगा; नहीं तो स्थिति 2024 के चुनाव जैसी हो सकती है।

जिसमें सपा आलोक रंजन को जिताने की स्थिति में थी, लेकिन बीजेपी ने आठवें उम्मीदवार के तौर पर संजय सेठ को उतार कर बाजी पलट दी थी। इस चुनाव में कुछ विपक्षी विधायकों ने क्रॉस वोटिंग कर बीजेपी के आठवें उम्मीदवार को जीत दिलायी थी।

अब बात इस बार के संभावित चेहरों की कर लेते हैं। यूपी में विधानसभा चुनाव सन्निकट है। ऐसे में दिल्ली से लखनऊ तक चुनावी शतरंज पर तेज मंथन जारी है। केंद्र सरकार में मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा को रिपीट करने की चर्चा जोरों पर है। पूर्व डीजीपी बृजलाल का दलित चेहरे के रूप में सदन में जाना तय माना जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार नए चेहरों में राष्ट्रीय महासचिव हरीश द्विवेदी, तेज तर्रार महिला नेत्री स्मृति ईरानी को देश के उच्च सदन में होना जरूरी बताया जा रहा है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो पार्टी एक अति पिछड़ा, एक दलित और एक महिला नए चेहरे को मौका देने की तैयारी में है। जिससे पीडीए का जवाब एनडीए की नयी सोशल इंजीनियरिंग से दिया जा सके।

समाजवादी पार्टी में रामगोपाल यादव का नाम लगभग तय माना जा रहा है, लेकिन समय के अनुरूप उम्र और स्वास्थ्य को लेकर पार्टी दूसरे विकल्प पर भी विचार कर सकती है। दूसरी सीट के लिए दुबारा आलोक रंजन का आजमाया जाना अवश्यंभावी लगता है या फिर संभव है पार्टी के रणनीतिकार किसी बड़े ओबीसी, दलित या ब्राह्मण चेहरे को लाकर PDA की अपनी अवधारणा मजबूत करें और साथ ही किसी अल्पसंख्यक को तीसरी सीट के लिए आगे लाकर सत्ताधारी दल की गणित बिगाड़ाने में कामयाब होने की कोशिश कर आगामी विधानसभा चुनाव के लिए समीकरण फिट करने में कामयाब हो जाएं।

ताजा चुनावी माहौल और सदन में दलगत स्थिति साफ इशारा कर रही है कि यह चुनाव निर्विरोध नहीं होने जा रहा है। भाजपा अगर आठवें उम्मीदवार पर जोखिम लेती है तो सुभासपा और निषाद पार्टी जैसे सहयोगियों से सतर्क रहना होगा और समाजवादी पार्टी अगर तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो उसे कांग्रेस के अलावा नाराज विधायकों को मनाना पड़ेगा साथ ही अन्य छोटे दलों को विश्वास में लेते हुए उन्हें अपने खेमें में लाना होगा।

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✍️Anil Shahi

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इस लेख में व्यक्त विचार, मत एवं विश्लेषण मूल लेखक के हैं। इसे केवल प्रकाशन हेतु संपादित किया गया है। विचारों, मतों या उनसे उत्पन्न परिणामों के लिए वेब पोर्टल अथवा प्रकाशक उत्तरदायी नहीं होंगे।

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