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20 सितंबर को पुरुलिया में कुड़मी समाज का ‘महा जुड़वाही’, ST दर्जे की मांग पर बड़ा शक्ति प्रदर्शन

पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले का कोड़ाडीह मैदान 20 सितंबर को कुड़मी समाज के एक बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक जुटान का गवाह बनने जा रहा है।✍️Vishwajeet bhatt

By HO BUREAU 

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पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले का कोड़ाडीह मैदान 20 सितंबर को कुड़मी समाज के एक बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक जुटान का गवाह बनने जा रहा है। यहां करम परबतिया ‘महा जुड़वाही’ (महाजुटान) का आयोजन किया जा रहा है। आयोजकों के मुताबिक, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और छत्तीसगढ़ के करीब 40 हजार कुड़मी बहुल गांवों से बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल होंगे।

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इस महाजुटान में करीब 6 लाख करम परबतिनों (महिलाओं) के पहुंचने का दावा किया जा रहा है। आयोजन को केवल शक्ति प्रदर्शन के तौर पर नहीं, बल्कि कुड़माली भाषा, संस्कृति, परंपरा और सामाजिक पहचान के बड़े सांस्कृतिक समागम के रूप में पेश किया जा रहा है।

गांव-गांव बैठक, जुटान की तैयारी

महाजुटान को लेकर कुड़मी समाज के स्तर पर व्यापक तैयारियां चल रही हैं। झारखंड के रामगढ़ के दुलमी समेत कई इलाकों में पंचायत और ग्राम स्तर पर बैठकें की जा रही हैं। समाज से जुड़े पदाधिकारी और कार्यकर्ता लोगों को आयोजन में शामिल होने के लिए लामबंद कर रहे हैं। इसके लिए पारंपरिक सामाजिक संस्थाओं और अखाड़ों से भी संपर्क किया जा रहा है।

40 हजार गांवों के अखाड़ों को न्योता

आयोजकों के अनुसार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और छत्तीसगढ़ के करीब 40 हजार कुड़मी बहुल गांवों के पारंपरिक अखाड़ों को महाजुटान में शामिल होने का आमंत्रण दिया गया है। यही वजह है कि आयोजन को क्षेत्र के सबसे बड़े सामाजिक-सांस्कृतिक जुटानों में से एक के रूप में देखा जा रहा है।

6 लाख महिलाओं के जुटने का दावा

इस महाजुटान का सबसे बड़ा आकर्षण करम परबतिनों की भागीदारी होगी। आयोजकों का दावा है कि लाखों महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में कार्यक्रम में शामिल होंगी। इससे आयोजन को एक बड़े सांस्कृतिक समागम का स्वरूप देने की तैयारी है, जहां कुड़माली परंपराओं, लोक संस्कृति और सामाजिक पहचान को प्रमुखता दी जाएगी।

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क्या है कुड़मी समाज की मुख्य मांग?

महाजुटान के केंद्र में कुड़मी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) सूची में शामिल करने की मांग है। इसके साथ ही कुड़माली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग भी उठाई जा रही है। समाज से जुड़े नेताओं का तर्क है कि छोटानागपुर पठार क्षेत्र में रहने वाले कुड़मी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक अधिकारों की रक्षा के लिए इन मांगों पर सरकार को निर्णय लेना चाहिए।

आंदोलन का पुराना इतिहास, प्रशासन अलर्ट

कुड़मी आंदोलन के पिछले चरणों में रेल और सड़क जाम जैसे आंदोलन देखने को मिले हैं। इन आंदोलनों के कारण रेल परिचालन और यातायात प्रभावित हुआ था। कुछ मौकों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति भी बनी थी। इसी पृष्ठभूमि को देखते हुए आगामी महाजुटान को लेकर पुरुलिया और आसपास के इलाकों में प्रशासन की नजर बनी हुई है।

इस बार शांतिपूर्ण आयोजन का दावा

आयोजन से जुड़े पदाधिकारियों का कहना है कि इस बार महाजुटान को शांतिपूर्ण और सांस्कृतिक स्वरूप में आयोजित किया जाएगा। समाज अपनी मांगों को लोकतांत्रिक तरीके से सामने रखना चाहता है और आम लोगों को किसी तरह की परेशानी न हो, इसका भी ध्यान रखा जाएगा।

ST दर्जे पर क्यों है इतना जोर?

कुड़मी समाज लंबे समय से अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग उठाता रहा है। झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा की राजनीति में समुदाय की बड़ी आबादी और चुनावी प्रभाव के कारण यह मुद्दा राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। वहीं, कुछ मौजूदा आदिवासी संगठनों की ओर से कुड़मी समुदाय को ST सूची में शामिल किए जाने को लेकर आपत्तियां भी सामने आती रही हैं। उनका तर्क है कि इससे मौजूदा ST समुदायों के आरक्षण और अधिकारों पर प्रभाव पड़ सकता है।

20 सितंबर को पुरुलिया में नजरें

अब सबकी नजर 20 सितंबर पर है। कोड़ाडीह मैदान में प्रस्तावित यह महाजुटान कितना बड़ा आकार लेता है और प्रशासन इसे किस तरह संभालता है, यह देखने वाली बात होगी। एक तरफ कुड़मी समाज अपनी भाषा, संस्कृति और ST दर्जे की मांग को लेकर बड़ी संख्या में जुटने की तैयारी कर रहा है, तो दूसरी ओर प्रशासन के सामने इतने बड़े जनसमूह के लिए यातायात, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती होगी।

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✍️Vishwajeet bhatt

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इस लेख में व्यक्त विचार, मत एवं विश्लेषण मूल लेखक के हैं। इसे केवल प्रकाशन हेतु संपादित किया गया है। विचारों, मतों या उनसे उत्पन्न परिणामों के लिए वेब पोर्टल अथवा प्रकाशक उत्तरदायी नहीं होंगे।

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