नई दिल्ली। राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर में CJI सूर्यकांत ने न्यायपालिका की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर अहम संदेश दिया।✍️अरविंद कुमार
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नई दिल्ली। राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर में CJI सूर्यकांत ने न्यायपालिका की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर अहम संदेश दिया। उन्होंने कहा कि अदालत की ताकत सिर्फ उसके फैसलों में नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया में है जिसके जरिए फैसला सामने आता है। हारने वाला पक्ष भी अगर यह माने कि उसके साथ निष्पक्ष व्यवहार हुआ, तभी न्याय व्यवस्था पर भरोसा मजबूत होता है।
नई दिल्ली में आयोजित राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत ने न्यायपालिका की सबसे बड़ी ताकत को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि अदालत की वैधता इस बात से तय नहीं होती कि फैसला किसके पक्ष में गया। असली कसौटी यह है कि फैसला सुनाने की पूरी प्रक्रिया कितनी निष्पक्ष और विश्वसनीय रही।
CJI के मुताबिक किसी मामले में हार जाना अदालत से भरोसा खत्म होने की वजह नहीं है। लेकिन अगर किसी पक्ष को लगे कि उसके साथ निष्पक्ष व्यवहार नहीं हुआ तो यह न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल बन जाता है।
CJI सूर्यकांत ने कहा कि अदालतों को लोगों की पसंद के फैसले देकर लोकप्रियता हासिल करने की जरूरत नहीं है। न्यायपालिका की विश्वसनीयता तब मजबूत होती है, जब वह पक्ष भी अदालत की प्रक्रिया को स्वीकार करे जिसके खिलाफ फैसला आया है।
यानी फैसला भले ही मनमाफिक न हो, लेकिन हारने वाले को यह भरोसा रहना चाहिए कि अदालत ने उसके मामले को निष्पक्ष तरीके से सुना और कानून के मुताबिक फैसला दिया।
CJI सूर्यकांत ने जनता के भरोसे को न्यायपालिका की सबसे बड़ी पूंजी बताया। उन्होंने कहा कि अदालतों की ताकत केवल उनके आदेशों में नहीं होती। अदालतों का अधिकार तभी प्रभावी रहता है, जब लोग बिना किसी दबाव के उसके आदेश को मानने के लिए तैयार हों।
उन्होंने जोर देकर कहा कि भरोसा कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे एक बार हासिल करने के बाद हमेशा के लिए सुरक्षित मान लिया जाए। हर सुनवाई, हर आदेश और हर मामले के जरिए यह भरोसा लगातार बनता है।
CJI ने कहा कि न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता का मतलब केवल अदालत के दरवाजे जनता के लिए खुले रखना या सार्वजनिक सुनवाई करना नहीं है। लोगों को यह समझ में आना भी जरूरी है कि अदालत किसी नतीजे तक कैसे पहुंची। फैसले के पीछे की वजह जितनी स्पष्ट होगी, न्याय व्यवस्था पर भरोसा उतना ही मजबूत होगा। खासतौर पर उस व्यक्ति के लिए जिसके खिलाफ फैसला आया है।
CJI सूर्यकांत ने यह भी कहा कि अदालतों को सोशल मीडिया और दूसरे बाहरी प्रभावों से दूरी बनाए रखनी चाहिए। अदालत का काम जनमत के दबाव में चलना नहीं, बल्कि कानून और निष्पक्ष प्रक्रिया के आधार पर फैसला करना है। उन्होंने साफ किया कि अदालत लोगों की पसंद या तत्काल लोकप्रियता के आधार पर अपनी विश्वसनीयता तय नहीं कर सकती।
CJI ने न्यायपालिका की आलोचना के सवाल पर भी स्पष्ट रुख रखा। उन्होंने कहा कि अदालतें आलोचना से परे नहीं हैं। न्यायिक कामकाज की तथ्यपरक और रचनात्मक आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था का जरूरी हिस्सा है।
उनके मुताबिक कोई भी संस्था खुद को सवालों और सार्वजनिक जांच से अलग रखकर लंबे समय तक जनता का भरोसा कायम नहीं रख सकती। सही आलोचना व्यवस्था में सुधार का रास्ता भी खोलती है।
CJI सूर्यकांत ने न्याय व्यवस्था की एक बड़ी चुनौती को भी स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि अदालतें कई बार आम लोगों को जटिल और दूर की संस्था लगती हैं। कानूनी प्रक्रिया इतनी पेचीदा हो सकती है कि उसे समझने और आगे बढ़ाने में संसाधन रखने वाले लोगों को अपेक्षाकृत आसानी होती है। उन्होंने माना कि इस हकीकत को स्वीकार किए बिना न्याय व्यवस्था में जरूरी बदलाव की शुरुआत नहीं हो सकती।
कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने न्यायपालिका और ट्रिब्यूनल में कथित भ्रष्टाचार को लेकर चिंता जताई। उन्होंने फिक्सर वकीलों की भूमिका का मुद्दा उठाते हुए कहा कि कानूनी बिरादरी में ऐसे लोगों की पहचान को लेकर जानकारी है। उन्होंने सुझाव दिया कि अगर ऐसे नाम पहले से जांच एजेंसियों के संज्ञान में नहीं हैं तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के सामने भी रखा जाना चाहिए।
राम जेठमलानी की विरासत का जिक्र करते हुए CJI सूर्यकांत ने उन्हें अदालत के माहिर कारीगर के तौर पर याद किया। उन्होंने कहा कि जेठमलानी ने विद्वता के साथ साहस और बुद्धिमत्ता के साथ सहज समझ का शानदार मेल दिखाया।
CJI सूर्यकांत के संबोधन का सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि न्यायपालिका का भरोसा किसी एक ऐतिहासिक फैसले या बड़े सुधार से नहीं बनता। यह रोजमर्रा की न्यायिक प्रक्रिया से बनता है।
पारदर्शिता, निष्पक्षता, स्पष्ट फैसले और जवाबदेही—ये छोटे दिखने वाले कदम ही लंबे समय में न्यायपालिका की विश्वसनीयता को मजबूत करते हैं, क्योंकि अदालत की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उसका आदेश नहीं, बल्कि उस आदेश को स्वीकार करने वाला जनता का भरोसा है।
✍️अरविंद कुमार
Disclaimer
इस लेख में व्यक्त विचार, मत एवं विश्लेषण मूल लेखक के हैं। इसे केवल प्रकाशन हेतु संपादित किया गया है। विचारों, मतों या उनसे उत्पन्न परिणामों के लिए वेब पोर्टल अथवा प्रकाशक उत्तरदायी नहीं होंगे।
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