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जीवित्पुत्रिका व्रत : नहाय-खाय आज, महिलाएं रखेंगी 35 घंटे का निर्जला व्रत, जानें पूजन- विधि

संतान के दीर्घ जीवन और आरोग्य के लिए रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका व्रत शुक्रवार को नहाय- खाय के साथ आरंभ हो चुका है इस तीन दिवसीय अनुष्ठान के लिए आज शनिवार को महिलाएं निर्जला व्रत रखेगी.

By Ruchi Kumari 
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हर साल आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवित्पुत्रिका व्रत करने का विधान है. हिंदू धर्म में जीवित्पुत्रिका व्रत का विशेष महत्व होता है. ये व्रत महिलाओं के लिए बेहद कठिन माना जाता है, क्योंकि इस व्रत को महिलाएं निर्जला रहकर करती हैं. इस पर्व को जीवित्पुत्रिका, जिउतपुत्रिका, जितिया, जिउतिया और ज्युतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है. माताएं ये व्रत पुत्र प्राप्ति, संतान के दीर्घायु होने एवं उनकी सुख-समृद्धि में वृद्धि के लिए करती हैं. इस दिन माताएं निर्जला व्रत रखकर व्रत का अनुष्ठान करती हैं. आइए जानते हैं जितिया व्रत की सही तिथि और मुहूर्त.

पढ़ें :- Jivitputrika Vrat 2022:जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व ,कथा और पूजा विधि

संतान के दीर्घ जीवन और आरोग्य के लिए रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका व्रत शुक्रवार को नहाय- खाय के साथ आरंभ होगा. इस तीन दिवसीय अनुष्ठान के दूसरे दिन शनिवार को महिलाएं निर्जला व्रत रखेंगी. पंडितों के अनुसार पूजा में जीमूतवाहन की कुशा से प्रतिमा बनाई जाती है.

सके बाद मिट्टी और गाय के गोबर से चील व सियारिन की प्रतिमा का निर्माण किया जाता है. फिर उस मूर्ति पर धूप-दीप, चावल, पुष्प, सिंदूर आदि अर्पित किया जाता है. इस अवसर पर जिउतिया व्रत की कथा सुनी जाती है और संतान की लंबी आयु और कामयाबी की प्रार्थना की जाती है. इस बार कुल मिलाकर 35 घंटे का निर्जला व्रत रखा जाएगा.

जीवित्पुत्रिका व्रत की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत के युद्ध में जब द्रोणाचार्य का वध कर दिया गया तो उनके पुत्र आश्वत्थामा ने क्रोध में आकर ब्राह्रास्त्र चल दिया, जिसकी वजह से अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहा शिशु नष्ट हो गया. तब भगवान कृष्ण ने इसे पुनः जीवित किया. इस कारण इसका नाम जीवित्पुत्रिका रखा गया. तभी से माताएं इस व्रत को पुत्र के लंबी उम्र की कामना से करने लगीं.

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