नई दिल्ली। 12 और 13 सितंबर को हुए 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में 11 सदस्य देशों ने वैश्विक व्यापार, निवेश, सुरक्षा, ऊर्जा, तकनीक, AI, स्वास्थ्य, जलवायु, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा की।✍️अरविंद कुमार
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नई दिल्ली। 12 और 13 सितंबर को हुए 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में 11 सदस्य देशों ने वैश्विक व्यापार, निवेश, सुरक्षा, ऊर्जा, तकनीक, AI, स्वास्थ्य, जलवायु, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा की। 140 बिंदुओं वाले नई दिल्ली घोषणापत्र को सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। भारत की अध्यक्षता में हुए इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन, रूस, ईरान और UAE समेत कई देशों के नेताओं के साथ अहम मुलाकातें भी हुईं।
नई दिल्ली में हुए BRICS सम्मेलन में वर्तमान 11 सदस्य देशों का समूह सामने आया। इसमें भारत, ब्राजील, रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया शामिल रहे। आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार BRICS का विस्तार होने के बाद समूह का एजेंडा अब सिर्फ आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहा है।
ब्राजील की ओर से विदेश मंत्री मौरो विएरा ने प्रतिनिधित्व किया, जबकि सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और अन्य प्रमुख नेताओं की मौजूदगी ने बैठक को खास कूटनीतिक महत्व दिया।
दो दिन की बैठक के बाद नई दिल्ली घोषणापत्र को सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। घोषणापत्र में राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग, आर्थिक और वित्तीय सहयोग तथा सांस्कृतिक और जन-से-जन संबंधों को BRICS के तीन प्रमुख स्तंभों के रूप में आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।
भारत ने BRICS के अगले दौर के लिए केवल घोषणाएं करने के बजाय फैसलों को जमीन पर लागू करने और संगठन में निरंतरता लाने की जरूरत पर जोर दिया।
BRICS सम्मेलन का सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला पहलू भारत और चीन के रिश्तों को लेकर रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ने यह संकेत दिया कि सीमा विवाद के बावजूद दोनों देश संवाद के रास्ते खुले रखना चाहते हैं। भारत की प्राथमिकता सीमा पर शांति और स्थिरता है। इसके साथ ही व्यापार, निवेश और आर्थिक संबंधों में मौजूद बाधाओं को कम करने की संभावनाओं पर भी चर्चा का माहौल बना है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि चीन के लिए भारत में निवेश का रास्ता पूरी तरह खोल दिया गया है। सुरक्षा और रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए निवेश भारतीय नियमों और सरकारी मंजूरियों के दायरे में ही रहेगा। यानी भारत-चीन संबंधों में टकराव के साथ संवाद और प्रतिस्पर्धा के साथ व्यावहारिक सहयोग का नया संतुलन दिखाई दे रहा है।
BRICS सम्मेलन में भारत और रूस के रिश्ते भी बेहद अहम रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच बैठक में राजनीतिक, आर्थिक, रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष, कौशल और लोगों के बीच संपर्क सहित कई क्षेत्रों में सहयोग की समीक्षा हुई।
भारत-रूस संबंध अब सिर्फ रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं हैं। ऊर्जा, उद्योग, व्यापार, अंतरिक्ष और तकनीक जैसे क्षेत्र इस साझेदारी को नई दिशा दे रहे हैं। रूस की औद्योगिक प्रदर्शनी INNOPROM India का आयोजन भी इसी बढ़ते औद्योगिक सहयोग की तस्वीर पेश करता है।
ऐसे समय में जब दुनिया में युद्ध, प्रतिबंध और बदलते शक्ति समीकरण हैं, भारत ने रूस के साथ अपने रणनीतिक रिश्ते को राष्ट्रीय हित के आधार पर आगे बढ़ाने का संदेश दिया।
BRICS सम्मेलन के दौरान ईरान की मौजूदगी इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि पश्चिम एशिया में तनाव और अमेरिका-ईरान संघर्ष ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा रखी थी। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुलाकात ने भारत-ईरान संबंधों को नया कूटनीतिक महत्व दिया। भारत ने किसी एक खेमे का हिस्सा बनने के बजाय बातचीत, कूटनीति और तनाव कम करने की नीति पर जोर दिया।
पश्चिम एशिया का संकट भारत के लिए सिर्फ विदेश नीति का विषय नहीं है। इसका सीधा संबंध ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार, भारतीय नाविकों और विदेशों में रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा से है। इसी वजह से BRICS घोषणापत्र में पश्चिम एशिया में अधिकतम संयम, नागरिकों की सुरक्षा और संवाद के जरिए समाधान की जरूरत पर जोर दिया गया।
BRICS के दौरान भारत-UAE रिश्तों की आर्थिक तस्वीर भी सामने आई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद के बीच मुलाकात में दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों की समीक्षा हुई।
इसी दौरान UAE की International Holding Company की ओर से ओडिशा में 11.5 अरब डॉलर के एकीकृत ग्रीनफील्ड एल्युमिनियम प्रोजेक्ट में निवेश की घोषणा का स्वागत किया गया। भारत सरकार के अनुसार यह भारत में अब तक का सबसे बड़ा एकीकृत एल्युमिनियम निवेश बताया गया है। यह निवेश BRICS सम्मेलन के समानांतर भारत-UAE आर्थिक साझेदारी की बड़ी तस्वीर पेश करता है।
BRICS सम्मेलन में ऐसा कोई एक सामूहिक फैसला नहीं हुआ कि कोई एक देश दूसरे देश में सबसे बड़ा निवेश करेगा। इसके बजाय BRICS के भीतर निवेश का माहौल आसान करने, व्यापार बढ़ाने, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने, औद्योगिक क्षमता बढ़ाने और तकनीकी सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया। नई दिल्ली घोषणापत्र में BRICS Economic Partnership 2030 को आगे बढ़ाने और सदस्य देशों के बीच व्यावहारिक आर्थिक सहयोग गहरा करने की बात कही गई है।
चीन ने 53 अफ्रीकी देशों के लिए शून्य-टैरिफ व्यवस्था का विस्तार करने की घोषणा की, जिससे अफ्रीका के साथ व्यापारिक और आर्थिक संबंधों को मजबूत करने का संकेत मिला।
BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को लेकर भी महत्वपूर्ण चर्चा हुई। घोषणापत्र में BRICS Cross-Border Payments Initiative के तहत भुगतान प्रणालियों की आपसी कनेक्टिविटी और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार तथा निवेश के निपटान पर चर्चा का उल्लेख है। हालांकि, दस्तावेज यह भी स्पष्ट करता है कि सभी देशों के लिए एक जैसी व्यवस्था थोपने की बात नहीं है।
इसका सीधा मतलब है,डॉलर को तुरंत हटाने की घोषणा नहीं, बल्कि वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को धीरे-धीरे मजबूत करने की कोशिश।
BRICS देशों ने बढ़ते व्यापार प्रतिबंधों, ऊंचे टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं पर चिंता जताई। घोषणापत्र में कहा गया कि इस तरह के कदम वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं में अनिश्चितता बढ़ा सकते हैं।
भारत सहित BRICS देशों ने विश्व व्यापार व्यवस्था को ज्यादा संतुलित, पारदर्शी और विकासशील देशों के हितों के अनुरूप बनाने की जरूरत पर जोर दिया।
भारत ने BRICS मंच पर आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख रखा। इसके साथ साइबर सुरक्षा, उभरती तकनीक, वित्तीय अपराध और सीमा पार अपराधों से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। भारत की BRICS अध्यक्षता की प्राथमिकताओं में आतंकवाद और साइबर सुरक्षा जैसे मुद्दे पहले से प्रमुख रहे हैं।
इस बार BRICS के एजेंडे में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI भी प्रमुखता से शामिल रही। सदस्य देशों ने AI को आर्थिक विकास और सामाजिक विकास के लिए उपयोगी बनाने के साथ-साथ इसके सुरक्षित, भरोसेमंद, समावेशी और जिम्मेदार इस्तेमाल पर जोर दिया। घोषणापत्र में Global South के देशों के लिए AI संसाधनों और तकनीक तक बेहतर पहुंच की जरूरत भी रेखांकित की गई। चीन ने BRICS AI Open Source Zone और 2027 में Service Trade Forum जैसे नए आर्थिक-तकनीकी सहयोग प्रस्तावों को भी आगे रखा।
BRICS में स्वास्थ्य क्षेत्र को भी महत्वपूर्ण जगह मिली। TB जैसी बीमारियों से निपटने, दवाओं और स्वास्थ्य उत्पादों का स्थानीय उत्पादन बढ़ाने, डिजिटल हेल्थ, AI आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था और भविष्य की महामारियों के लिए तैयारी पर सहयोग बढ़ाने की बात हुई। मानसिक स्वास्थ्य, वैक्सीन अनुसंधान और परमाणु चिकित्सा में भी सहयोग को आगे बढ़ाने की बात घोषणापत्र में शामिल है।
इसके अलावा शहरी विकास, सुरक्षित और किफायती आवास, पानी, स्वच्छता, कचरा प्रबंधन और टिकाऊ परिवहन जैसे मुद्दों पर भी सहयोग की दिशा तय की गई।
ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन भी बैठक के महत्वपूर्ण विषय रहे। BRICS देशों ने स्वच्छ ऊर्जा और टिकाऊ विकास के साथ-साथ महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित बनाने पर जोर दिया। भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर, बैटरी और आधुनिक तकनीक के लिए जरूरी खनिजों की वैश्विक आपूर्ति अब रणनीतिक विषय बन चुकी है।
BRICS सम्मेलन का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश Global South को लेकर रहा। भारत ने जोर दिया कि विकासशील देशों को वैश्विक संस्थाओं में सिर्फ नियमों का पालन करने वाला पक्ष नहीं, बल्कि नियम बनाने में भी प्रभावशाली भूमिका मिलनी चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार की मांग को BRICS ने फिर मजबूती से उठाया। नई दिल्ली घोषणापत्र में ज्यादा प्रतिनिधित्व वाली और न्यायसंगत अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
नई दिल्ली सम्मेलन के साथ भारत की 2026 BRICS अध्यक्षता समाप्त हुई। अब 2027 में चीन BRICS की अध्यक्षता करेगा और अगला शिखर सम्मेलन चीन में होगा। नई दिल्ली घोषणापत्र में चीन को अगले अध्यक्ष के रूप में पूरा समर्थन दिया गया है।
यह भी अपने आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत और चीन के बीच सीमा और रणनीतिक मतभेदों के बावजूद दोनों देश एक ही बहुपक्षीय मंच को आगे बढ़ाने के लिए साथ काम कर रहे हैं।
पूरे सम्मेलन को देखें तो भारत ने तीन बड़े संदेश देने की कोशिश की। पहला राष्ट्रीय हित और रणनीतिक स्वायत्तता के साथ सभी प्रमुख शक्तियों से संवाद। दूसरा Global South की आवाज को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में ज्यादा मजबूत करना और तीसरा व्यापार, तकनीक, ऊर्जा और सुरक्षा के क्षेत्र में BRICS को सिर्फ बयान देने वाला मंच नहीं बल्कि व्यावहारिक सहयोग का मंच बनाना।
भारत ने चीन से संवाद रखा, रूस के साथ रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाया, ईरान के साथ संपर्क बनाए रखा और UAE जैसे साझेदारों के साथ आर्थिक सहयोग को मजबूत किया। यही भारत की संतुलित और बहुध्रुवीय विदेश नीति की तस्वीर BRICS सम्मेलन में दिखाई दी।
नई दिल्ली का BRICS सम्मेलन सिर्फ दो दिन की बैठक नहीं रहा। 140 बिंदुओं के घोषणापत्र में व्यापार, निवेश, स्थानीय मुद्रा में भुगतान, AI, स्वास्थ्य, ऊर्जा, जलवायु, महत्वपूर्ण खनिज, आतंकवाद, साइबर सुरक्षा, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, शहरी विकास और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे कई क्षेत्रों के लिए सहयोग की दिशा तय की गई।
सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि BRICS अब सिर्फ ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का आर्थिक समूह नहीं है। विस्तार के बाद यह दुनिया की बदलती शक्ति संरचना में Global South की आवाज को मजबूत करने वाला बड़ा राजनीतिक और आर्थिक मंच बन चुका है।
और भारत के लिए इस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि नई दिल्ली ने एक ही मंच पर चीन से संवाद, रूस से रणनीतिक साझेदारी, ईरान से कूटनीतिक संपर्क, UAE से निवेश और Global South के साथ नेतृत्व इन सभी को एक साथ साधने की कोशिश की।
यानी BRICS 2026 का संदेश साफ है। दुनिया बदल रही है, शक्ति संतुलन बदल रहा है और भारत इस बदलती व्यवस्था में सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि दिशा तय करने वाले देशों में अपनी जगह मजबूत करना चाहता है।
✍️अरविंद कुमार
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