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दीपावली का त्योहार आ गया पास, मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों को खुशहाली की आस

HO BUREAU

घरों को रोशन करने वाले इस प्रकाश पर्व पर मिट्टी के दीयों का अपना एक खास महत्व है। इन दीयों को अपने हाथों से तैयार करने वाले कुम्हारों के लिए दीपावली कमाई का सबसे बड़ा अवसर होती है। मगर बदलते समय के साथ इस आधुनिक जमाने में मिट्टी के दीयों की मांग घटती जा रही है। इनकी जगह चाइनीज झालरों और इलेक्ट्रॉनिक लाइटों ने बाजार में अपनी खास जगह बना ली है।

दीपावली का त्योहार आ गया पास, मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों को खुशहाली की आस
With Diwali approaching, earthen lamp-making potters are hopeful of prosperity.
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दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में रौनक देखने को मिल रही है। घरों की सजावट से लेकर पूजा-पाठ की तैयारियां तेज हो गई हैं। इस बीच मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों के चेहरे पर भी उम्मीद की एक नई चमक दिखाई दे रही है। सालभर मेहनत कर मिट्टी के दीये और अन्य पारंपरिक सामान तैयार करने वाले कारीगरों को इस बार अच्छे कारोबार की उम्मीद है। उन्हें आस है कि दीपावली पर लोग उनके बनाए मिट्टी के दीये खरीदकर उनके घरों में भी खुशहाली का उजाला लेकर आएंगे।

दिन-रात मेहनत कर दीयों को दे रहे आकार

आपको बता दें, दीपावली से कई सप्ताह पहले ही कुम्हार अपने काम में जुट जाते हैं। कोई चाक पर मिट्टी को आकार देकर दीये तैयार करता है, तो कोई उन्हें धूप में सुखाने और पकाने का काम देखता है। इसके बाद दीयों को रंगों और आकर्षक डिजाइनों से सजाया जाता है, ताकि ग्राहक इन्हें पसंद करें। छोटे-बड़े आकार के दीयों के साथ सजावटी दीपक और पूजा में इस्तेमाल होने वाले मिट्टी के बर्तन भी तैयार किए जा रहे हैं।

कुम्हारों के लिए दीपावली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि साल के सबसे महत्वपूर्ण कारोबार का समय भी होती है। इस दौरान होने वाली बिक्री से उन्हें अच्छी आमदनी की उम्मीद रहती है। ऐसे में त्योहार से पहले उनका पूरा परिवार इस काम में हाथ बंटाता है।

आधुनिक सजावट के बीच पारंपरिक दीयों की अपनी पहचान

घरों को रोशन करने वाले इस प्रकाश पर्व पर मिट्टी के दीयों का अपना एक खास महत्व है। इन दीयों को अपने हाथों से तैयार करने वाले कुम्हारों के लिए दीपावली कमाई का सबसे बड़ा अवसर होती है। मगर बदलते समय के साथ इस आधुनिक जमाने में मिट्टी के दीयों की मांग घटती जा रही है। इनकी जगह चाइनीज झालरों और इलेक्ट्रॉनिक लाइटों ने बाजार में अपनी खास जगह बना ली है।

ग्राहकों से कुम्हारों को बड़ी उम्मीद

कुम्हारों का कहना है कि मिट्टी के दीये बनाने में काफी मेहनत और समय लागता है। मिट्टी जुटाने से लेकर दीयों को तैयार करने, पकाने और सजाने तक कई चरणों से गुजरना पड़ता है। ऐसे में उन्हें उम्मीद है कि त्योहार के दौरान अच्छी बिक्री होगी और उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिलेगा।

दीपावली खुशियों और रोशनी का पर्व है। इस बार जब लोग अपने घरों को रोशन करने के लिए बाजारों का रुख करें, तो मिट्टी के दीये बनाने वाले कारीगरों को भी याद रखें। उनके हाथों से तैयार छोटे-छोटे दीये न सिर्फ घरों को रोशन करते हैं, बल्कि सदियों पुरानी भारतीय परंपरा और मेहनतकश कारीगरों की उम्मीदों को भी जीवित रखते हैं।

कई पीढ़ियों से मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों का कहना है कि अब पहले जैसी बिक्री नहीं होती। कुशीनगर के कुम्हार प्रदीप ने लोगों से मिट्टी के दीये खरीदने की अपील की है, ताकि दीपावली पर दूसरों के घर रोशन करने वाले कुम्हारों के घरों में भी खुशियों का उजाला हो सके।

✍️Satyam Kushwah

Disclaimer

इस लेख में व्यक्त विचार, मत एवं विश्लेषण मूल लेखक के हैं। इसे केवल प्रकाशन हेतु संपादित किया गया है। विचारों, मतों या उनसे उत्पन्न परिणामों के लिए वेब पोर्टल अथवा प्रकाशक उत्तरदायी नहीं होंगे।

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