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CBI का शिकंजाः अनसुलझी है जियाउल हक की हत्या का रहस्य, फिर घेरे में राजा भैया, 10 साल पहले हुआ था कत्ल

यूपी के प्रतापगढ़ के कुंडा तहसील में सीओ रहे जियाउल हक की हत्या का रहस्य 10 साल बाद भी रहस्य ही है। एक बार फिर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से जांच करने को कहा है। इसमें कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि राजा भैया की भूमिका की पड़ताल हो। हालांकि इससे पहले सीबीआई मामले की जांच कर चुकी है और इसमें राजा भैया को क्लीन चिट दिया था।

By Rakesh 

Updated Date

लखनऊ। यूपी के प्रतापगढ़ के कुंडा तहसील में सीओ रहे जियाउल हक की हत्या का रहस्य 10 साल बाद भी रहस्य ही है। एक बार फिर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से जांच करने को कहा है। इसमें कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि राजा भैया की भूमिका की पड़ताल हो। हालांकि इससे पहले सीबीआई मामले की जांच कर चुकी है और इसमें राजा भैया को क्लीन चिट दिया था।

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उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले का तहसील है कुंडा। कहा जाता है कि कुंडा में कोई भी काम  राजा भैया की मर्जी के बिना नहीं होते। हालांकि राजा भैया इससे इंकार करते हैं। वह इन बातों से बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखते। जियाउल हक कुंडा में साल 2013 में सीओ के पद पर तैनात थे। जब जियाउल हक हत्याकांड में उनका नाम आया तो उन्होंने खुद ही सीबीआई जांच की मांग कर डाली थी।

सीबीआई ने जांच भी की, लेकिन वो बेदाग निकले। इसके बाद उन्हें आरोपी बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को नए सिरे से जांच के लिए सीबीआई को आदेश दिए हैं।

आखिर क्या है जियाउल हक हत्याकांड की कहानी

आखिर क्या है जियाउल हक हत्याकांड की कहानी। इसे समझते हैं। दो मार्च साल 2013, दोपहर का समय था। कुंडा विधानसभा क्षेत्र के गांव बेंती में ग्राम समाज की जमीन की पैमाइश होनी थी। इस पैमाइश के दौरान ग्राम प्रधान नन्हे सिंह यादव के साथ गांव के ही कुछ लोगों की झड़प हो गई। इसमें दूसरे पक्ष के लोगों ने नन्हें को गोली मार दी। पुलिस ने नन्हें सिंह को अस्पताल पहुंचाया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। इतने में रात के आठ बजे गए और पुलिस ने पोस्टमार्टम कराने की बजाय ग्राम प्रधान का शव अस्पताल में ही परिजनों को दे दिया।

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थोड़ी देर बाद पुलिस को अपनी गलती का एहसास हुआ तो सीओ जियाउल हक, कोतवाल सर्वेश मिश्रा समेत अन्य पुलिस वाले शव लेने गांव पहुंच गए, लेकिन वहां पहले से जमा भीड़ आक्रोशित हो गई और पुलिस पर हमला कर दिया। संयोग से पुलिस वाले जिस गली में भागे, वह संकरी थी। इसमें आगे-आगे सीओ और कोतवाल थे, वहीं बाकी पुलिस वाले उनके पीछे भाग रहे थे।

जब पुलिस वाले गली के मुहाने पर पहुंचे तो देखा कि पहले से भीड़ उनका इंतजार कर रही थी। उन्हें देखकर पुलिस वाले पलट कर भागने लगे। ऐसे में सीओ और कोतवाल सबसे पीछे हो गए। वहीं जब भीड़ की ओर से गोली चली तो सीओ को लगी और वहीं गिर गए।

इस वारदात में 20 से अधिक लोग चश्मदीद गवाह थे। पुलिस ने इस मामले में कुल 4 एफआईआर दर्ज की थी। हालांकि इनमें किसी में भी राजा भैया का नाम नहीं था। कुछ दिन बाद सीओ जियाउल हक की पत्नी परवीन आजाद थाने पहुंची और इस वारदात की साजिश में शामिल होने का आरोप लगाते हुए राजा भैया और उनके सहयोगी गुलशन यादव, हरिओम श्रीवास्तव, रोहित सिंह और संजय सिंह उर्फ गुड्डू को नामजद करा दिया।

उस समय विधानसभा की बैठक चल रही थी और राजा भैया लखनऊ में थे। उन्हें जैसे ही इसकी खबर मिली, वह खुद आगे बढ़े और सीबीआई जांच और खुद के लाई डिटेक्टर टेस्ट कराने की मांग कर दी। अब सीबीआई ने मामले की जांच करते हुए साल 2013 में ही ट्रॉयल कोर्ट में चार्जशीट लगा दिया। इसमें सीबीआई ने मामले में राजा भैया की भूमिका को नकारते हुए कुल 14 लोगों को आरोपी बनाया था, लेकिन ट्रायल कोर्ट को CBI की चार्जशीट पर भरोसा नहीं हुआ।

देवरिया जिले में नोनखार गांव के रहने वाले थे सीओ जियाउल हक

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इसके बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, जहां कोर्ट ने साल 2022 में ट्रॉयल कोर्ट की आपत्तियों को खारिज करते हुए CBI की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार किया। इससे सीओ जियाउल हक की पत्नी को धक्का लगा और वह सुप्रीम कोर्ट पहुंच गईं।

अब सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए ट्रॉयल कोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी है। कहा है कि सीबीआई को इस वारदात में राजा भैया की भूमिका की पड़ताल नए सिरे से करनी चाहिए। सीओ जियाउल हक मूलरूप से देवरिया जिले में नोनखार गांव के रहने वाले थे। साल 2012 में उनकी तैनाती कुंडा में हुई थी।

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