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₹80 हजार की देसी डिवाइस बचाएगी मरीज के अंग! RIMS के डॉक्टरों ने तैयार किया कंपार्टमेंट प्रेशर मॉनिटर

Jharkhand : रांची के RIMS में डॉक्टरों ने डिजिटल प्रोटोटाइप तैयार किया। समय पर इलाज में बड़ी मदद मिल सकती है।✍️Vishwajeet bhatt

By HO BUREAU 

Updated Date

Jharkhand : रांची के राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (RIMS) के ऑर्थोपेडिक्स विभाग के डॉक्टरों ने गंभीर दुर्घटनाओं में मरीजों के अंगों को बचाने की दिशा में एक अहम पहल की है। टीम ने करीब ₹80 हजार की लागत से स्वदेशी डिजिटल डिवाइस तैयार की है, जो गंभीर चोट के बाद मांसपेशियों के भीतर बढ़ने वाले कंपार्टमेंट प्रेशर को मापने में मदद करेगी। इस प्रोटोटाइप को तैयार करने में डॉक्टरों की टीम को करीब 1 साल 8 महीने लगे। इसका उद्देश्य ऐसी स्थिति की समय रहते पहचान करना है, जिसमें देरी होने पर नसों और मांसपेशियों को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है और गंभीर मामलों में अंग काटने तक की नौबत आ सकती है।

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हादसे के बाद शरीर में क्या होता है?

सड़क दुर्घटना, गंभीर फ्रैक्चर, मलबे में दबने या अन्य बड़ी चोट के बाद मांसपेशियों के आसपास बने बंद हिस्से यानी कंपार्टमेंट में दबाव तेजी से बढ़ सकता है। इसे एक्यूट कंपार्टमेंट सिंड्रोम (Acute Compartment Syndrome) कहा जाता है। दबाव बढ़ने पर उस हिस्से में रक्त का प्रवाह प्रभावित हो सकता है। अगर समय पर स्थिति की पहचान और इलाज न हो, तो मांसपेशियों और नसों को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।

RIMS की डिवाइस कैसे करेगी काम?

नई डिजिटल डिवाइस प्रभावित अंग के कंपार्टमेंट में मौजूद दबाव को मापने के लिए इस्तेमाल की जाएगी। डॉक्टरों को इससे प्रेशर की रीडिंग डिजिटल रूप में मिल सकेगी। यानी मरीज की स्थिति पर नजर रखते हुए डॉक्टर यह तय करने में मदद ले सकेंगे कि दबाव खतरनाक स्तर तक पहुंच रहा है या नहीं और तत्काल सर्जिकल हस्तक्षेप की जरूरत है या नहीं।

शुरुआती कुछ घंटे बेहद अहम

एक्यूट कंपार्टमेंट सिंड्रोम में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। लंबे समय तक रक्त प्रवाह बाधित रहने पर ऊतकों को स्थायी नुकसान हो सकता है। ऐसे मामलों में जरूरत पड़ने पर फैसियोटॉमी (Fasciotomy) की जाती है। इस सर्जरी में प्रभावित कंपार्टमेंट का दबाव कम किया जाता है, ताकि रक्त प्रवाह बहाल हो सके और मांसपेशियों व नसों को बचाने की कोशिश की जा सके।

पुरानी तकनीक से क्या अलग है?

पारंपरिक कंपार्टमेंट प्रेशर मापन में सुई और मैनुअल गेज जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। RIMS की टीम का डिजिटल प्रोटोटाइप इसी प्रक्रिया को ज्यादा सुविधाजनक और डिजिटल बनाने की दिशा में विकसित किया गया है।

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नई डिवाइस की खासियत

डिजिटल रीडिंग के जरिए प्रभावित हिस्से के दबाव की निगरानी को आसान बनाने का लक्ष्य है। टीम इसे आगे लगातार मॉनिटरिंग और ज्यादा उन्नत तकनीक के लिए विकसित कर रही है।

अगला लक्ष्य बिना सुई के प्रेशर मापना

RIMS की टीम इस तकनीक को भविष्य में और अपग्रेड करने पर काम कर रही है। लक्ष्य ऐसी नॉन-इनवेसिव यानी सुई-मुक्त तकनीक विकसित करना है, जिससे बिना शरीर में सुई डाले कंपार्टमेंट प्रेशर का आकलन किया जा सके। अगर यह तकनीक सफल होती है, तो गंभीर चोट वाले मरीजों की मॉनिटरिंग को और आसान बनाया जा सकता है।

अभी ट्रायल बाकी, CDSCO को भेजा गया प्रोटोकॉल

यह डिवाइस फिलहाल प्रोटोटाइप और शोध के चरण में है। प्रोजेक्ट का रिसर्च प्रोटोकॉल केंद्रीय दवा मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) को भेजा गया है। नियामकीय मंजूरी मिलने के बाद इसके क्लिनिकल ट्रायल की दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा। ट्रायल के नतीजों और आवश्यक मंजूरियों के बाद ही इसके व्यापक चिकित्सकीय इस्तेमाल का रास्ता साफ होगा।

RIMS की टीम ने तैयार किया प्रोटोटाइप

इस डिजिटल डिवाइस को विकसित करने वाली टीम में RIMS के ऑर्थोपेडिक्स विभाग के डॉ. एल.बी. मांझी, विभागाध्यक्ष, ऑर्थोपेडिक्स, डॉ. कुमार सौरभ, एसोसिएट प्रोफेसर, डॉ. गोविंद कुमार जूनियर रेजिडेंट शामिल हैं। करीब 20 महीने की मेहनत के बाद टीम ने इस स्वदेशी डिजिटल प्रोटोटाइप को तैयार किया है।

क्यों खास है RIMS की पहल?

एक्यूट कंपार्टमेंट सिंड्रोम जैसी आपात स्थिति में सबसे अहम चीज है समय पर खतरे की पहचान। RIMS की यह पहल कंपार्टमेंट प्रेशर की डिजिटल निगरानी को आसान बनाने की दिशा में है। सिर्फ ₹80 हजार के आसपास की लागत में तैयार स्वदेशी प्रोटोटाइप की सबसे बड़ी खासियत इसकी कम लागत और स्थानीय स्तर पर विकसित तकनीक है। हालांकि, इसके वास्तविक क्लिनिकल उपयोग और प्रभावशीलता का आकलन ट्रायल और नियामकीय प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही किया जा सकेगा।

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स्वदेशी प्रोटोटाइप एक नजर में डिवाइस : डिजिटल कंपार्टमेंट प्रेशर मॉनिटर
कहां तैयार हुई: RIMS, रांची
लागत: करीब ₹80,000
विकास अवधि: करीब 1 साल 8 महीने
उद्देश्य: मांसपेशियों के भीतर बढ़ते दबाव की निगरानी
स्थिति: प्रोटोटाइप/रिसर्च चरण
अगला कदम: CDSCO प्रक्रिया और क्लिनिकल ट्रायल
भविष्य का लक्ष्य: नॉन-इनवेसिव यानी सुई-मुक्त मॉनिटरिंग

✍️Vishwajeet bhatt

Disclaimer

इस लेख में व्यक्त विचार, मत एवं विश्लेषण मूल लेखक के हैं। इसे केवल प्रकाशन हेतु संपादित किया गया है। विचारों, मतों या उनसे उत्पन्न परिणामों के लिए वेब पोर्टल अथवा प्रकाशक उत्तरदायी नहीं होंगे।

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