Delhi Building Collapse : दिल्ली के सत्य निकेतन में पीजी की पांच मंजिला इमारत ढहने और सात लोगों की मौत के बाद शुरू हुई कानूनी कार्रवाई अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है।✍️अरविंद कुमार
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Delhi Building Collapse : दिल्ली के सत्य निकेतन में पीजी की पांच मंजिला इमारत ढहने और सात लोगों की मौत के बाद शुरू हुई कानूनी कार्रवाई अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को अपने पास ट्रांसफर करने के बजाय दिल्ली हाईकोर्ट को ही जांच और उससे जुड़ी कानूनी कार्रवाई की निगरानी जारी रखने को कहा। अदालत का रुख साफ है कि मामले में कार्रवाई आगे बढ़ रही है और अब इसे अंजाम तक पहुंचाना जरूरी है।
सत्य निकेतन की इमारत गिरने के बाद सबसे बड़ा सवाल सिर्फ पीजी संचालक या मकान मालिक की जिम्मेदारी का नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम का है, जो राजधानी में ऐसी इमारतों के निर्माण, इस्तेमाल और सुरक्षा की निगरानी करता है। हादसे के बाद सामने आए हालात ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर नियमों के बावजूद असुरक्षित इमारतें छात्रों के रहने की जगह कैसे बनती रहीं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस मामले को सिर्फ एक इमारत तक सीमित नहीं रखा। अदालत ने पीजी व्यवस्था, छात्रों के लिए हॉस्टल की कमी और भवनों की सुरक्षा से जुड़े पूरे नियामक ढांचे पर सवाल उठाए हैं।
सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने एमसीडी को अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी पीजी हॉस्टलों का निरीक्षण करने का निर्देश दिया है। निगम को यह बताना है कि इन इमारतों के पास जरूरी मंजूरी है या नहीं और कहीं भवन नियमों का उल्लंघन तो नहीं हो रहा।
अदालत ने यह भी साफ किया कि अगर जांच में यह सामने आता है कि संबंधित इमारतें बिना अनुमति या भवन नियमों के उल्लंघन में बनाई गई थीं तो सिर्फ मालिक की जिम्मेदारी तय करना पर्याप्त नहीं होगा। लापरवाही करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी तय करनी होगी।
सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली में अवैध और असुरक्षित निर्माण के खिलाफ एमसीडी ने कार्रवाई तेज कर दी है। निगम ने अलग-अलग इलाकों में तोड़फोड़ और सीलिंग की कार्रवाई शुरू की है। बुधवार को ही कई संपत्तियों पर कार्रवाई की गई और दर्जनों अन्य संपत्तियों के खिलाफ आगे की कार्रवाई के आदेश दिए गए।
यानी सत्य निकेतन की त्रासदी के बाद अब दिल्ली में उन इमारतों की भी जांच शुरू हो गई है, जहां नियमों को दरकिनार कर निर्माण या व्यावसायिक गतिविधियां चलने का शक है।
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू दिल्ली में पढ़ने वाले बाहर के छात्रों की सुरक्षा है। विश्वविद्यालयों में पर्याप्त हॉस्टल उपलब्ध नहीं होने के कारण बड़ी संख्या में छात्र निजी पीजी पर निर्भर हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी माना है कि छात्रों के लिए पर्याप्त हॉस्टल व्यवस्था नहीं होने से उन्हें निजी पीजी में रहना पड़ता है।
इसी मुद्दे को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में एक अलग जनहित याचिका भी पहुंची है, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के सभी कॉलेजों में छात्रों के लिए हॉस्टल सुविधा उपलब्ध कराने की मांग की गई है। अदालत ने केंद्र, दिल्ली सरकार और दिल्ली विश्वविद्यालय से जवाब मांगा है।
सत्य निकेतन हादसे के बाद दिल्ली में कार्रवाई जरूर तेज हुई है, लेकिन असली परीक्षा इस बात की है कि यह अभियान कितनी दूर तक जाता है। अगर किसी इमारत में नियमों का उल्लंघन वर्षों से चल रहा था तो सवाल यह भी है कि उस पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले की निगरानी दिल्ली हाईकोर्ट के हाथ में ही रहने दी है। ऐसे में अब हाईकोर्ट के सामने सिर्फ सत्य निकेतन हादसे की जांच नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की जवाबदेही तय करने की चुनौती भी है, जिसके रहते छात्रों को सुरक्षित छत के लिए निजी पीजी पर निर्भर होना पड़ा।
सात मौतों के बाद दिल्ली में बुलडोजर और सीलिंग की कार्रवाई शुरू हो गई है, लेकिन असली सवाल यही है। क्या यह कार्रवाई हादसे के बाद की औपचारिकता बनेगी या राजधानी में पीजी और अवैध निर्माण के पूरे सिस्टम को बदलने की शुरुआत होगी?
✍️अरविंद कुमार
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