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राजद्रोह के नए केस दर्ज करने पर सुप्रीम कोर्ट ने लगायी रोक

- सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कानून की समीक्षा करने की दी अनुमति

By Akash Singh 
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नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह के कानून पर केंद्र को कानून की समीक्षा की अनुमति दे दी है। चीफ जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली बेंच ने राजद्रोह के तहत फिलहाल नए केस दर्ज करने पर रोक लगा दी है। कोर्ट जुलाई के तीसरे हफ्ते में सुनवाई करेगा। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी पर केस दर्ज हो तो निचली अदालत से राहत की मांग करे। कोर्ट ने लंबित मामलों में अभी कार्रवाई पर रोक लगाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि जेल में बंद लोग निचली अदालत में ज़मानत याचिका दाखिल करें।

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केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा है कि उसने राजद्रोह के मामले में लगने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए की फिर से जांच करने और इस पर दोबारा विचार करने का फैसला किया है। केंद्र सरकार ने हलफनामा के जरिये कहा था कि इस प्रावधान के बारे में विभिन्न न्यायविदों, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों और सामान्य रूप से नागरिकों की ओर से सार्वजनिक रुप से अलग-अलग विचार व्यक्त किए गए हैं। केंद्र सरकार ने कहा है कि वो प्रधानमंत्री की इस धारणा के अनुरूप है कि हमारे देश को आजाद हुए 75 वर्ष हो चुके हैं, वह अपने औपनिवेशिक बोध को दूर करने की दिशा में काम करना चाहते हैं। इसी भावना के तहत केंद्र सरकार ने 2014-15 में 1500 से अधिक पुराने कानूनों को खत्म कर दिया है। केंद्र सरकार ने 25 हजार से अधिक अनुपालन बोध को भी समाप्त कर दिया है, जो हमारे देश के लोगों के लिए गैरजरूरी बाधा उत्पन्न कर रहे थे। विभिन्न किस्म के अपराध जो लोगों को बिना सोचे समझे बाधा पहुंचा रहे थे, उन्हें अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है।

कोर्ट ने 5 मई को कहा था कि सबसे पहले वो इस बात पर विचार करेगा कि मामला संविधान बेंच को सौंपा जाए या नहीं। 15 जुलाई, 2021 को सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस एनवी रमना ने केंद्र सरकार से पूछा था कि क्या आजादी के 75 साल बाद भी राजद्रोह जैसे क़ानून की ज़रूरत है। चीफ जस्टिस ने कहा था कि कभी महात्मा गांधी, तिलक जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की आवाज़ को दबाने के लिए ब्रिटिश सत्ता इस क़ानून का इस्तेमाल करती थी। क्या आजादी के 75 साल बाद भी राजद्रोह कानून की जरूरत है।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा था कि राजद्रोह में दोषी साबित होने वालों की संख्या बहुत कम है लेकिन अगर पुलिस या सरकार चाहे तो इसके जरिये किसी को भी फंसा सकती है। इन सब पर विचार करने की जरूरत है। याचिका सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल एस जी बोम्बतकरे ने दायर की है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा था कि राजद्रोह कानून वापस नहीं लिया जाना चाहिए। बल्कि कोर्ट चाहे तो नए सख्त दिशानिर्देश जारी कर सकता है ताकि राष्ट्रीय हित में ही इस कानून का इस्तेमाल हो।

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