दिल्ली SIR विवाद में चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं। Form 6 में बदलाव और चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। आयोग ने फैसलों पर उठे दावों को खारिज किया है। ✍️अरविंद कुमार
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नई दिल्ली: दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विवाद अब सिर्फ मतदाताओं के नाम, नोटिस और सूची में बदलाव तक सीमित नहीं रह गया है। चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और आयोग की कार्यप्रणाली पर राजनीतिक बहस तेज कर दी है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों को लेकर उन्हें जानकारी या सहमति में शामिल नहीं किए जाने पर सवाल उठाए।
इस पूरे विवाद में सबसे अहम मुद्दों में से एक Form 6 में कथित बदलाव है। यह वह वैधानिक फॉर्म है, जिसका इस्तेमाल नए मतदाता के पंजीकरण के लिए किया जाता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, SIR के दौरान Form 6 में ऐसा सवाल जोड़ा गया, जिसमें नए मतदाता से उसके या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी के पिछले SIR की मतदाता सूची में मौजूद होने से जुड़ी जानकारी मांगी गई। चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव पर आपत्ति जताते हुए कथित तौर पर कहा था कि वैधानिक फॉर्म में इस तरह का बदलाव नियमों में संशोधन के बिना नहीं किया जा सकता। सुखबीर सिंह संधू ने भी इस आपत्ति से सहमति जताई थी।
इसके बाद सवाल उठा कि Form 6 में बदलाव किस प्रक्रिया और किस अधिकार के तहत किया गया? अगर आयोग के दो सदस्यों ने इस पर आपत्ति दर्ज कराई थी, तो निर्णय आगे किस प्रक्रिया से बढ़ा और इसकी औपचारिक मंजूरी कैसे हुई?
आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। केजरीवाल ने चुनाव आयुक्तों के कथित पत्रों का हवाला देते हुए दावा किया कि कई मौकों पर आयोग की औपचारिक मंजूरी के बिना आधिकारिक आदेश और संचार जारी किए जाने पर आपत्ति जताई गई थी।
केजरीवाल ने 28 अक्टूबर 2025, 16 अप्रैल 2026 और 24 अप्रैल 2026 के कथित पत्रों का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि अगर किसी आदेश को आयोग की औपचारिक मंजूरी हासिल नहीं थी, तो उसकी वैधता क्या होगी।
कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भी Form 6 में कथित बदलाव को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाए हैं। सिंघवी का आरोप है कि CEC के स्तर से वैधानिक Form 6 में बदलाव किया गया, जबकि उनके मुताबिक ऐसे बदलाव के लिए संबंधित नियमों में संशोधन आवश्यक है।
यह मुद्दा उस रिपोर्ट के बाद और गंभीर हो गया, जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने Form 6 में बदलाव पर आपत्ति दर्ज कराई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, संधू ने बाद में इस बदलाव को कथित तौर पर अनधिकृत और अवैध बताते हुए इसे हटाने की बात कही थी।
राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने भी चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। सिब्बल का दावा है कि तीन सदस्यीय आयोग में फैसले निर्धारित प्रक्रिया के तहत सामूहिक रूप से लिए जाने चाहिए, जबकि उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ मामलों में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अपने स्तर पर फैसले लिए।
सिब्बल के मुताबिक, चुनाव आयुक्त संधू और जोशी ने कई बार ऐसे फैसलों पर आपत्ति दर्ज कराई। हालांकि, ये राजनीतिक आरोप हैं और चुनाव आयोग की ओर से इन दावों को खारिज किया गया है।
आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह ने भी SIR में कथित अनियमितताओं को लेकर चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाए हैं।
सुधाकर सिंह का कहना है कि SIR को लेकर विपक्ष की ओर से कई आपत्तियां और सबूत सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे गए थे, लेकिन उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। उन्होंने चुनाव आयोग के भीतर सामने आए विवाद को लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था से जोड़ते हुए गंभीर सवाल उठाए और कहा कि आयोग के भीतर जो कुछ चल रहा है, वह संविधान की धज्जियां उड़ाने जैसा है।
विपक्ष के आरोपों और अंदरूनी मतभेदों की रिपोर्ट के बीच चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने इन दावों को खारिज किया है। आयोग के सूत्रों के मुताबिक, SIR समेत चुनाव आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और इनमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ दोनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी शामिल थी।
आयोग की ओर से यह भी कहा गया है कि रिपोर्ट में जिन मुद्दों को लेकर आपत्तियों का जिक्र किया गया है, उन्हें व्यापक निर्णय प्रक्रिया के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
एक तरफ रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई कथित आपत्तियां हैं, तो दूसरी तरफ चुनाव आयोग का यह कहना है कि SIR समेत उसके सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
ऐसे में बहस का केंद्र अब यही है,क्या आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी थी? Form 6 में बदलाव किस अधिकार के तहत किया गया? अगर दो चुनाव आयुक्तों ने किसी फैसले पर आपत्ति दर्ज कराई, तो उस आपत्ति का निपटारा किस तरह हुआ? और SIR जैसे बड़े मतदाता पुनरीक्षण अभियान में निर्णय लेने और जवाबदेही की प्रक्रिया कितनी स्पष्ट रही?
SIR विवाद अब केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण का मुद्दा नहीं रह गया है। यह मामला चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया, संस्थागत पारदर्शिता और मतदाता के अधिकारों को लेकर भी बड़े सवाल खड़े कर रहा है।
✍️अरविंद कुमार
Disclaimer
इस लेख में व्यक्त विचार, मत एवं विश्लेषण मूल लेखक के हैं। इसे केवल प्रकाशन हेतु संपादित किया गया है। विचारों, मतों या उनसे उत्पन्न परिणामों के लिए वेब पोर्टल अथवा प्रकाशक उत्तरदायी नहीं होंगे।
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