Pratapgarh : जिले की नगर पंचायत कटरा मेदनीगंज इन दिनों विकास की एक नई परिभाषा गढ़ रहा है। यहां कागजों पर विकास की गंगा बह रही है।✍️अतुल यादव
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Pratapgarh : जिले की नगर पंचायत कटरा मेदनीगंज इन दिनों विकास की एक नई परिभाषा गढ़ रहा है। यहां कागजों पर विकास की गंगा बह रही है और जमीन पर (या यूँ कहें कि नालियों में) कचरे का समंदर उमड़ रहा है। लाखों का बजट जब सरकारी फाइलों से होते हुए नगर की गलियों में पहुंचता है, तो वह जनता की सहूलियत बनने के बजाय नालियों में सड़ रही गंदगी का ‘अंबार’ बन जाता है।
इस अद्भुत व्यवस्था के पीछे हमारे अधिशासी अधिकारी (EO) और नगर पंचायत अध्यक्ष की जुगलबंदी की जितनी तारीफ की जाए, कम है। दोनों ने मिलकर एक ऐसा बेहतरीन तालमेल बिठाया है कि बजट पास करने की रफ्तार और नालियों में कचरा जमा होने की रफ्तार, दोनों बिल्कुल बराबर चल रही हैं।शायद हमारे साहबान यह मान चुके हैं कि जब तक नालियां पूरी तरह लबालब न भर जाएं, तब तक सफाई का असली’अंजाम’ और ‘बजट का सही उपभोग’ दिखाई नहीं देता।
नगर पंचायत की बेचारी मच्छरों के संगीत और बदबू के इत्र का लुत्फ उठाने को मजबूर है, जबकि प्रशासन ‘फंड’ की गड़गड़ाहट में खोया हुआ है। ऐसा लगता है कि नगर पंचायत के कर्णधारों ने गांधी जी के ‘स्वच्छता अभियान’ को कुछ ज्यादा ही गहराई से ले लिया है—इतना गहरा कि सफाई सिर्फ फाइलों के पन्नों में दफन होकर रह गई है। उम्मीद है कि कभी साहबान एसी कमरों से बाहर निकलेंगे, ताकि उन्हें लाखों के बजट और नालियों के इस ‘अंघोषित गठजोड़’ का एहसास हो सके।
2 अक्टूबर को स्वच्छता का संदेश देने वाले जिम्मेदार अधिकारी क्या कटरा मेदनीगंज की गंदगी पर भी नजर डालेंगे, या स्वच्छता अभियान सिर्फ कागजों और फोटो तक ही सीमित रहेगा?
✍️अतुल यादव, संवाददाता, प्रतापगढ़
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